अंकल सेम की दुनिया 22
२० अप्रैल
बालिका रेप
दिल्ली में एक पांच साल की बच्ची से रेप हुआ।
आरोपी उसे मरा छोडकर भागा उसके मुंह में बोतल और लोहे का टुकडा ठूंस दिया। कुछ दिन
पूर्व दिल्ली में दामिनी के साथ बर्बरता हुई ही थी। दामिनी के बाद तो लगता है कि
देश में महिलाओं पर जुल्म का अंवार टूट पड़ा हो। अखबार हो या टीवी चैनल उन पर इस
प्रकार की घटनाओं की भरमार है।
ऐसा लगता है कि बेटियों को डसने के लिए सब ओर विशेष नाग बैठे
है। वे अवसर की तलाश में है। जब मौका मिले तब सामने पड़ी युवती को डस लें। बहशियत
इतनी बढ़ी की पांच साल की बच्ची तक सुरक्षित नहीं है।
समझ में नहीं आता क्या होगा इस विषैले नागों से
निपटने के लिए अब क्या हमे फिर विष कन्यायें बनानी पड़ेगी। वासना, सैक्स
दिमाग में छिपा विकार है। कब ,किसके दिमाग में उभरे पता नहीं। हमारें यहां शक्ति
सम्पन्न व्यक्ति राजा महाराजा इस बीमारी का शिकार रहे है और उनसे लडऩे के लिए...ने
विष कन्याओं को जन्म दिया। बचपन में ही बहुत खूबसूरत कन्याओं को चुना जाता और
उन्हें वासना के मूर्ख राजा महाराजाओं से लडऩे के लिए तैयार किया जाता। उन्हें
थोड़ी थोड़ी विष की खुराक देनी प्रारंभ की जाती और बाद में भयंकर विष सेवन कराएं
जाते। इस विष के सेवन से ये कन्या तो नहीं मरती। किंतु इससे सैक्स करने के इच्छुक
.... राजाओं के शरीर में इसका थूक रक्त और शरीर स्पर्श करते इतना भयंकर जहर प्रवेश
कर जाता कि वे एड़ी रगड़ −रगड़ कर जान दे देते। हमारे इतिहास में ऐसी घटनाओं की
भरमार है। तो क्या हमें आने वाले समय के लिए फिर से ऐसी कन्याएं तैयार करनी होगी।
कानून से फांसी देने से तो यह अपराध रूकने से रहा। जिन मुलकों में बलात्कार के लिए
फांसी का प्रावधान है, वहां भी बलात्कार होते है।
ऐसे में क्या हो, वर्तमान
में तो युवतियों को शिक्षित करने ऐसे दानवों से सचेत रहने के लिए तैयार करना ही एक
उपाएं है। मेरी राय में एक दूसरा उपाय है बचपन से ही बच्चियों को आत्म रक्षा का
प्रशिक्षण देना। उन्हें जूड़े −कराटे सिखाना ताकि वे बचपन से ही अपने पर होने वाले
खतरों का सामना करने को तैयार रहे। हम भारतीय बच्चों से बात करने वाले, उन्हें
लाड़ प्यार जताने वाले को नजर अंदाज कर देते है। सोचते है कि वह बच्चों को प्यार
कर रहा होगा। किंतु कई बार उसका यह प्यार बच्चे की मौत का कारण बन जाता है।
यहां अमेरिका में यहां के निवासी अज्ञात
व्यक्ति को बच्चों से बात नहीं करने देते। अज्ञात व्यक्ति को बच्चे का फोटो नहीं
खींचने देते। ये ऐसा क्यों करते है मैं नहीं जानता। भाषा की समस्या होने के कारण
किसी से पूछ भी नहीं पाया। पर अब सोचते है कि शायद वह भारत जैसे देश में बच्चों के
प्रति हो रहे घटनाओं को लेकर बहुत सचेत है। बहुत संवेदनशील है। हमें भी ऐसा भी
बनना होगा। भारतीय समाज को नएं सांज में ढालना होगा।
चाय की दुकान
अमेरिका में भारत की तरह थोक में राजनैतिक दल
नहीं होते न राजनेता। प्राय: दो पार्टी रहती है। एक सत्ता में एक विपक्ष में। भारत
की तरह नहीं कि जिसे देखों वे राजनीति में आ रहा है। करना धरना कुछ नहीं खादी का
कुर्ता पायजामा लटकाओं और बन गए राजनेता। आपको चाहे राजनीति की समझ हो या नहीं।
कुर्ता पायजामा पहने देख भारतवासी समझ जाते है कि ये राज नेता है। जैसे हम खाकी
कपड़े पहन समझ लेेते है कि ये पुलिसवाला है। पीले कपड़े पहने देख समझ लेते है कि
ये साधु है ऐसे ही खादी का कुर्ता पायजामा पहने देखते ही पहचान जाते है कि नेता
है। पहले गांधी टोपी भी नेता की पहचान होती थी। कांग्रेसी तो जरूर पहनते थे। नेहरू
के युग तक खूब चली। इंदिरा जी के आने के बाद ये गायब हो गई। राजीव गांधी के कुछ
फोटो गांधी कैप में शुरू के है किंतु फिर उन्होंने इसे खूंटी पर टाग दिया। पुराने
कांग्रेसी अब भी लगात है। अन्ना भी गांधी टोपी पहनते है। ये टोपी अब अन्ना के
चेलों ने कब्जा ली और सब टोपी पहनने नजर आने लगे। मैं अन्ना हूं। चोर उच्चके भी
अन्ना बन गए। अब इसे अन्ना के चेले अरविंद केजरीवाल ने विधिवत रूप से ग्रहण कर
लिया।
बात थी कि अमेरिकन में राजनैतिक समझ...नहीं
होती। वे इसमें पडते भी नहीं। पिछले ढाई माह से अमेरिका में रहकर मैने इसका कारण
खोजा।
और समझ में आया कि अमेरिकन में ज्यादा राजनैतिक
समझ और ज्यादा राजनैतिक दलों के न होने का कराण है कि यहां भारत की तरह गली
मुहल्लों, चौराहों पर पान और चाय की दुकान नहीं है। न यहां के व्यक्ति पान खाते
है।
यहां गली मुहल्लों की दुकान है बड़े बड़े स्टोर
है। वालमार्ट जैसे हमारे यहां के मॉल की
तरह है यहां स्टोर होते है इन स्टोर में जरूरत का सब सामान मिलता है। सुई से लकर
साईकिल तक, आलू से लेकर कचालू तक। फल सब्जी, कपडे
जूता सब एक जगह मिलता है। न कोई आपको भारत की तरह सामान दिखाने वाला मिलता है,
न सामान के गुण बताने वाला खुद जाइए देखिए और खरीद लीजिए। भारत की
तरह नही है कि आप दुकान पर जाएंगे। दुकानदार सामान दिखाएंगा। उनके गुण बताएंगा।
....का वर्णन करेगा। जो क्वालिटी नहीं होगी वह भी बता देगा। शायद इन दुकानदारों
द्वारा सामान की प्रशंसा और गुण बखान करने को देख भारत के रतिकाल के कवियों ने
सुंदरी के नव...वर्णन करने की सीखी होगी। तभी जायसी के काम में आता है पर भारत का
....वर्णन कई और कवियों ने अपने काव्य का हीरोइन का नि....वर्णन लिखा है।
भारत में पान और चाय की दुकान राजनीति के
महत्वपूर्ण अड्डे है। यहां आने वाले राजनीति के बड़े जानकार होते है अलग अलग
विषयों के ....पान तैयार होने के समय में यहां राजनीति पर गंभीर चिंतन और मनन होता
है। आप को भी राजनीति के बारे में जानकारी करनी है तो चार −पांच रूपए खर्च करने
पड़ेगे। पान की दुकान पर ....पान बनने तक आपसे देश की आधुनिक राजनीति, आधुनिक
घटनाक्रम की जानकारी मल जाएगी। कुछ और गंभीर चिंतन करना है तो चाय की दुकान पर चले
जाइए।
यहां आप देखेेगें की यहां आने वाले कितने बड़े
राजनीति के जानकार होते है। गांव −देहात की दुकानों पर खाली समय में भी ये राजनेता
बैठे रहते है और करते रहते है, देश की राजनीति, राजनेताओं
के हालत पर टिप्पणी। भारत में राजनीति का ज्ञान यहां से शुरू होता है राजनीति के
स्कूल काँलेज नहीं होते पान और चाय की दुकान ही इसकी पाठशाला होती है।
इन्हें ज्ञान भी कितना होता है इसके लिए एक
किस्सा सुनाता हूं। बिजनौर एमएलसी क्षेत्र की वोटों की गिनती के दिन कि हमें
बरेली जाना पड़ा। कही ....कहा था कि कोन आगे है हमारे साथी एक पान की दुकान पर
पहुंचे और वहां खड़े लोगों से पूछा एमएलसी का क्या हुआ। वहां पान लेने के इंतजार
में खड़ा एक तपाक से बोला इमरजेंसी कब से लगी? हमारे
साथी ने स्पष्ट किया अरे आज यहां एमएलसी की काउटिंग थी। उसमें कौन जीता। सफेद
चकाचक कुर्ता पायजामा पहने महानुभाव ने पान का बीड़ा मुंंह में दवाया ।हाथ पर लगे पान
के अवशेष सिर पर रगड़ कर साफ करके बड़ी गंभीर मुर्दा में फरमाया अरे परेशान होते
हो सबेरे अखबार में पढ़ लेना, क्या हुआ, कौन जीता?
कोन हारा उससे सब सही पता लग जाएगा।
मैं अपने देश की राजनीति की ....की पान और चाय
की दुकान पर ज्यादा नहीं लिखूंगा। यदि कहीं किसी अमेरिकन ने पढ़ लिया तो वह भी
अमेरिका में गली−मुहल्लों में पान और चाय की दुकान खुलवा देगा। भारत की पान की
दुकान और चाय की दुकानरूपी पाठशाला में पढ़े लिखे भारत के नेताओं ने जैसे यहां देश
का कवाड़ किया है ऐसे ही ये अमेरिका का कवाड़ कर देंगे। पूरे देश में भ्रष्टाचार कर
उसे लूटेगा और भ्रष्टाचार का कमाया पैसा स्विस बैंक में भरकर उन्हेंं मालामाल बना
देंगे।
३० अप्रैल।
पिछले एक सप्ताह से एक मादा गीज झील के किनारे
मिट्टी में बैठी है। दिन हो या रात एक ही जगह जमी है इस समय दिन में गर्मी काफी
होती है दो तीन दिन पूर्व बारिश भी अच्छी हुई किंतु मैने उसे अपनी जगह जमें पाया।
कुछ देर को उठी तो पास ही झील के किनारे अपने उदर की पूर्ति कर अपनी जगह आ जमी।
८-१० दिन पूर्व झील के पूर्व और ...के छोर पर
किनारे से कुछ फिट ऊपर मिट्टी ....देख अंशुल ने कहा था कि शायद यह यहां अंडे देगी।
मिट्टी हटाकर वह वहां जमी रही। शाम को मैने देखा कि मिट्टी इकसार कर दी गई और गीज
आसपास पानी में घूम रही है। लगता था कि मिट्टी में उसने अंड्डे छिपा दिए। अगले दिन
से मैं लगातार उसे इस गड्डे के ऊपर देख रहा हूं। मिट्टी में छिपे अंडो में बच्चों
के लिए तापमान बनाए रखने के लिए वह एक ही जगह जमी है।
कल सोसाइटी वाले आए थे। दो अलग अलग गाड़ी में
रूकने छाता खोलकर गीज को अंडे देने की जगह
से हटाया। गीज वही आसपास जमी रही। कभी इधर जाती कभी उधर। दूसरे ने अंडों को हटाकर उनमें छेदकर जगह एकसार कर दी । पास में ही कुछ दूरी पर दूसरी गीज के अंडो के साथ भी यही हुआ। यहां
रहने वालो ने विरोध किया तो उन्होंने कहा कि ये प्रोब्लम किए है। वे अंडो में छेद
कर चले गए किंतु गीज अभी भी अपनी जगह है। इस आशा में की उनसे उनके बच्चे निकलेगे।
एक ने बताया कि ये गीज आते −जाते रहते थे। मौसम बदलने पर चले जाते थे। अब नहीं
जाते। गंदगी ज्यादा करते है। इसीलिए सोसाइटी स्टाफ नहीं चाहता इनकी संख्या बढ़े।
इंसान ही नहीं पशु पक्षी सृष्ठि को चलाने के
लिए अपनी संतान के लिए किनती पीड़ा कष्ठ उठाते है ये गीज से समझा जा सकता है। हम
प्राणी को बच्चों को इसलिए पालते पोसते है कि वह हमारे बुढापे का सहारा बनेगा। जब
हमारा शरीर साथ नहीं देगा, तब वह हमार हाथ पकड़ कर हमें गोद उठाकर
हमार ध्यान रखेगा। इस गीज को तो उसकी भी जरूरत नहीं। पक्षियों के बच्चे बड़े होकर
अपने रास्ते चले जाते है। इसके वाजूद भी ये भी प्रजनन में इतनी पीढ़ा कितना कष्ठ
झेलते है। यह समझा जा सकता है। झील के किनारे बत्तखों के छोटे छोटे चार पांच इंच
के बच्चे नजर आने लगे है बसंत आने पर पेड़− पौधे तो अपनी छटा बिखेरते है। ऊन पर नए
पुष्प फल आते है। लगता है यहां झील के आसपास रहने वाली बत्तख और गीज का प्रजनन का
सीजन चल रहा लगता है।
एक दिन मैं और निर्मल घूम रहे थे देखते क्या है
है कि दो बत्तख मैथुनरत है। इन्हें देखकर इतना आश्चर्य नहीं हुआ आश्चर्य यह देखकर
हुआ कि इस जोडे के चारों ओर एक बत्तख तेजी से गोल −गोल चक्कर लगा रही है। एक अन्य
बत्तख जोडे के पास आने को बढ़ी तो चारों ओर घूमने वाली बत्तख उसका विरोध करने बढ़
गई और उसे भगा दिया।
हम आगे चले आए। यहां रहने वाले ये गीज हमारे
यहां के बगलों से काफी बड़े होते है। ये प्राय: जोडे में रहते है और उड़कर एक
स्थान से दूसरी जगह चले जाते है लड़ते समय बड़ी तीखी आवाज करते है।
बत्तखे उड़ नहीं पाती। यहां प्रत्येक सोसाइटी में
कई −कई झील बनी है। इनमें ये बत्तख और गीज आराम से रहते है। गीज कीड़े −मकोड़े के
साथ झील के किनारे उगी घास भी खाते रहते है।
यहां सोसाइटी बनाते समय भूमि को समतल नहीं किया
गया। नीचे स्थान को झील बना दिया गया। ऊंचे स्थान पर भवन आदि विकसित कर दिए गए।
और मैं थक गया।
भारत में अमेरिका में सिनसिनाटी तक का सफर लगभग
१२ हजार किमी की दूरी। हमें सिनसिनाटी में रहने वाले अपने पुत्र अंशुल और उसकी
पत्नी के पास जाना है। हमारे पास एक बड़ा लगेज बैग और दो प्लेन में साथ ले जाने
वाले बैग है। इसी तरह निर्मल के पास भी एक सामान का बैग और एक पर्स है। पर्स में
काफी सामान होने से वह काफी वजनी हो गया है।
मंजुल, निशांत और
बिटिया के पति नीरज अग्रवाल एयरपोर्ट तक छोडऩे आए है। हमारे पास यूनाइटेड एयरलाइंस
के टिकट है। एयरलाइंस के काउंटर पर जाकर प्लेन में हम से अलग लगेज में जाने वाले
लगैज एयरलाइन कर्मियों को सौंप दिए और हाथ के कंधे पर लटकाए इटीग्रेशन पर चले गए।
वहां फारमलटी पूरी की ओर अंदर एयरलाइंस गेट न पांच की ओर चल दिए। कंधे वाले बैग
में दोनों के अलग अलग छह छह सात-सात किलोग्राम के आसपास वजन है। एयरलाइंस के
काउंटर से गेट तक की दूरी लगभग एक किमी से ज्यादा होगी हमने पैदल चलकर ही पूरी की।
एक स्थान पर इलेक्ट्रेानिक्स कार जरूरतमंदो को उनकी पहुंच तक लेकर जा रही थी, हम चाहते तो वह ले सकते थे हमने उसे भी नहीं लिया। चैक इन के बाद का रास्ता बहुत खूबसूरत था। स्थान से स्थान पर कस्टम फ्री...थी। इन पर भिन्न भिन्न प्रकार की मंदिरा विस्की उपलब्ध थी। बोतल की बनावट और प्रकार भी बड़े बड़े खूबसूरत थे। मैं मदिरा नहीं लेता किंतु मन में था कि सभी बोतले खरीद ली जाएं। किताब और मैंगजीन के काउंटर थे तो खाद्य पदार्थो के भी। घड़ी बिक रही थी, तो कही ज्वैलरी। हालांकि हमारे फ्लाइट में एक डेढ़ घंटे का समय था। किंतु हमने इसे नजर अंदाज कर दिया और आगे बढ़ गए। पूरे रास्ते पर कार्पेट बिछी थी। कहीं कोई गंदगी नहीं। लोग आ रहे थे, जा रहे थे। किसी को किसी से कोई लेना देना नहीं सबको अपनी अपनी पड़ी थी। आपाधापी का माहौल।
गेट नं पांच पर एक शीशे का बहुत लंबा चौड़ा
स्थान है।, इसके बाहर सुरक्षाकर्मी है। वे पेपर चैक कर
अंदर जाने दे रहे है। इस शीशे के अंदार हाल के अंंदर फर्श पर एक गोरे विदेशियों का
ग्रुप आराम कर रहा है। इस ग्रुप में लड़कियां ज्यादा है। बड़ी सुंदर सुंदर
लड़कियां। रंग बिरंगी तितलियों जैसी लाल लाल लाल गुलाब जैसे। कई की आंखे नीली झील
जैसी। किंतु अधिकांश के चेहरे सपाट है नाक
नक्श भारतीयों जैसे सुंदर नहीं,
लगता है प्रकृति ने इन्हे बनाते समय जल्दी की। फरमे ढंग से डिजाइन
नहीं किए और वैसे ही ढाल दिया। हां ढलने के बाद बहुत खूबसूरत रंग किए।
एयर पोर्ट पर सुरक्षा
जांच में हमारे जूते नहीं उतरवाएं गए। पर यहां जूते भी उतरवाएं और उन्हें
सुरक्षा जांच की मशीन से निकाला गया। इस मशीन के अंदर जाने वाले बैंग का मशीन के
बाहर एक्सरा सा दीखता रहता है। सुरक्षाकर्मी जांचते रहते है कि बैंग आदि में क्या
क्या सामान है। कुछ खतरनाक तो नहीं है।
यहां बहुत खूबसूरत कुर्सिया पड़ी है। लम्बी
लम्बी लाइनों में। एक साथ तीन − चार आदमी बैठ सकते है। कुछ लंबी आराम
कुर्सियां भी है। आराम कुर्सी भरी है एक कुछ स्त्री पुरूष उन पर लेटे है। फ्लाइट
पकड़ कर साढ़े १५ घंटे की यात्रा पूरी कर हम नेवार्क एयरपोर्ट पर उतरे। अपना सामान
लिया। लगभग एक किमी अंदर से अंदर चलने के बाद हम पेपर्स की सुरक्षा जांच कराकर
नीचे पहुंचे ओर अपने लगेज बैग लिए। निर्मल ने बताया कि बैग रखने वाली ट्राली ले
लो। कई व्यक्ति ले रहे है। आते समय अंशुल ने बताया था कि भारत में ट्राली फ्री है
किंतु यहां तीन डालर किराया देना पड़ता है। हमने फ्लाइट में साइड से बैठे और
ट्राली ले रहे युवक से पूछा तो उसने किराया पांच डालर बताया।
हमने ट्राली न लेने का निर्णय ले लगेज .... से
अपने बैग लिए। उनके हैंडिल में ... के बैग फंसाए और बैग को पहियों के सहारे लेकर
चल दिए। बैग में पहिल लगे होने के कारण कोई परेशानी नहीं हो रही थी। बड़े बड़े हाल
शीशे के केबिन आदि से गुजरते कस्टम की प्रक्रिया पार कर हम लगभग चार फलांग का सफर
कर वहां पहुंचे जहां हमें लगेज वाले बैग सौपने थे।
इस सारी प्रक्रिया में किसी को हमारी मद्द नहीं
करनी थी, सफर पर निकले है तो अपना सामान भी स्वयं ही उठाना था।
इस सब को पूरा कर फ्लाइट पकड़ हम सिनसिनाटी
पहुंच गए। यहां बैग एकत्र करने की जगह पर अंशुल और शिल्पी मिल गए। अंशुल ने हमें
कुर्सी पर बैठा दिया और खुद बैग ....से बैग एकत्र किए। बैंग पट्टिका एक लंबे चक्र
में घूमती रहती है। इस पर विमानकर्मी यात्रियों के सामान के लगेज में जाने वाले
बैग रख देते है। यात्री पट्टिका के चारो ओर खड़े रहते और पहचान कर अपने अपने बैग
उठाते रहते है। अंशुल ने हमारे दोनों बैग उठा लिए।
लगैज बैंग में पहिलए लगे होत है। इन बैग में
मजबूत लोहे के हैंडिल होते है। ये हैंडिल जरूरत पर बैग से बाहर निकाल लिए जाते है।
हैडिंल भी जरूरत के हिसाब से कम या ज्यादा हो सकते है। इनमें लॉक होते है। जो आपकी
चाही जगह पर इन्हें रोक देते है
अंंशुल दोनों बैग खुद ले जाना चाहता था किंतु
मैने एक बैग खुद ले लिया और एक अंशुल को दे दिया।
यहां से लगभग ५० कदम की दूर शीशे का निकलने
वाला गेट था। उसे पारकर हम बाहर आ गए। बाहर लगभग तीन फलांग दूर पार्किग में अंशुल
की कार खड़ी थी। अंशुल तेज चला हुआ था ताकि कार में जल्दी अपना बैंग जल्दी रखकर
लौटे और मेरा बैग संभाल ले। मेरी कोशिश थी कि उसे ज्यादा परेशानी न हो और कार तक
में बैग ले चलू। इस यात्रा के दौरान नेवार्क में मुझे बैग लेकर काफी दूर चलना पड़ा
था। क्योंकि वहां सब खुद करना था। अत: कोई परेशानी नहीं थी, और यहां
पर अंशुल के पीछे चलने में मुझे परेशानी को रही थी। बेग बहुत भारी लग रहा था। तो
कभी नीचे से थकान क्यों थी। यह नहीं समझ आ रहा था। किंतु लगता था कि इसका कारण
शायद मंजिल पर पहुंचने की निश्ििचंतीता है थकान अंशुल को पार्किग में खड़ी कार को
देखकर हो रही है। यदि गन्तव्य नजर न आता तो शायदयह थकान भी नहीं होती। अंशुल कार
के पास पहला बैग छोड़कर तेजी से वापस आकर मेरा बैग संभाल लेता था...और मुझे मुझसे
कर देता है थकान फ्री होने का...।
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