अंकल सेम की दुनिया दो
आगे एक द्वार के पास रोक लिया गया। यहां से
अंदर जाना था यहां तीन पंक्तियां बनी थी। बुलाने पर एक .. पर पहुंचे वहां ही
उगलियों की जांच की जा रही थी। यहां से हमें आगे बढ़ा दिया। आगे एक लंबा हॉल था।
बीच में काफी जगह थी। दाई साडड में पैसा जमा कराने जैसे काउंटर बने थे और दूसरी
साइड में लम्बाई में बैंचनुमा कुर्सियां थी। वहां हम जाकर बैठ गए। यहां से आगे हाल
में एक ... कैशियर की प्लेट लगी थी। उसके आगे भी बैंच कुर्सी पर कुछ लाग बैठे थे।
उन्हें देखकर हम सोच रहे थे कि यहां से इंटरव्यू के लिए अंदर जाना होगा।
दाई साइड के काउंटर पर नंबर बाइज लोगों को
बुलाया जा रहा था। कुछ को वहां से प्रिंटेट हरा कार्ड मिल रहा था। हमने समझा यह कि
इस कार्ड से हम इंटरव्यू देने जाएगे। काउंटर पर एक अमेरिकन ... प्रत्येक आवेदक से
कुछ पूछता और उसे कार्ड देकर आगे बढ़ा देता।
नंबर आने पर मैने और निर्मल ने उसे फोटो और
उसके साथ लगा आवेदन का पत्र दिया उसने उन्हें पढ़ कम्प्यूटर पर कुछ पढ़ते निर्मल
से पूछा क्यों अमेरिका जाना चाह रहे हो, निर्मल ने बताया
बेटे ने बुलाया है। उसने.... किस कंपनी में है आदि एक दो सवाल किए। फिर मुझसे पूछा
आप क्या करते है। मेरे जर्नलिस्ट बताने पर उसने गुड मार्निग किया और बोला आपका
वीजा एपरूप हो गया। निर्मल ने पूछा दोनों का उसने कहा हां। हमें यकीन नहीं हुआ।
मुझे लगा कि इंटरव्यू तो हुआ ही नहीं वीजा कैसे हो गया। उसने कहा कि आपके पेपर सही
है। वीजा स्वीकृत हो गया और .. कार्ड हमें दे दिया। आगे इंक्वायरी के काउंटर से
हमने पूछता कि पासपोर्ट उसने कहा कि खुद ले लो या कोरियर से मगाले। कोरियर की फीस
आगे जमा होनी है। दोनो कार्डो को मैन यहां
पढ़ा।.........................
इसी पर लिखा था कि पासपोर्ट तैयार होने की
सूचना आपको मेल या फोन पर दे दी जाएगी।
बाहर हॉल में जहां हमें नंबर दिया गया था,
वहीं काउंटर पर कोरियर से पासपोर्ट मंगाने की फीस जमा हो रही थी।
हमारे शहर के पिन कोड को देखकर उसने कहा दिया कि आप के यहां कोरियर की सुविधा नहीं
है। आपको खुद ही लेना है। यहां से हम बाहर आए। काउंटर से मोबाइल लेकर रिंकू को
बताया कि वीजा हो गया है। उसने कहा हमारे को ....में सुविधा नहीं है। अतं अंशुल को
भी बता दो।
एक मिनट बाद अंशुल का फोन था। शिल्पी से भी बात
हुई। बीजा होने की दोनों ने बधाई दी। पार्किग में कार में नीरज बैठा था। वहां से
हमें मंजुल के कमरे पर आ गए। बीजा होने का यकीन होनी हो रहा था। हम समझते थे कि
इंटरव्यू टेबिल पर बैठ कुछ व्यक्तिगत साक्षात्कार, फाइल
देखेगे, सवाल करेगे। जाने क्या पूछ ले। मन में आए सवाल के उत्तर को सोचकर याद
कर लिए थे किंतु ऐसे इंटरव्यू हो जाएगा, यह कल्पना भी
नहीं थी।
लगभग १५ दिन से चला आ रहा तनाव खत्म हो गया था।
सो में रिलेक्स के लिए मंजुल के बिस्तर में उसका कंबल ओढ़कर सो गया। कुछ देर में
क्लास खत्म होने पर मंजुल का फोन आया कहां है क्या हुआ, हमारे
वीजा होने की बात बताने और उसके कमरे पर होने की सूचना देने पर वह भी कमरें पर आ
गया।
पहले शाम को पासपोर्ट मिल जाते थे। हमें भी यही
उम्मीद थी। बताया गया कि पासपोर्ट तैयार हो गया है शाम को तीन से पांच बजे के बीच
नेहरू पैलेसे से मिलेगा। हमने कई बार कॉल सेंटर को फोन किया। हमारे पासपोर्ट की
लोकेशन व अमेरिकन एबंसी ने बताया कि .......के ग्रीन कार्ड में लिखा था कि
पासपोर्ट तैयार होने में २-३ दिन भी लग सकते है। पासपोर्ट तैयार होने की सूचना
आपको हम.. और एसएमएस से दे दी जाएगी।
पासपोर्ट न मिलने की उम्मीद देख हम कनाट प्लेस
में निकल गए। मैने लेकर का कोट लिया, निर्मल के लिए उपलब्ध नहीं था सो उसका
ऑर्डर दिलाया। और वापस चले दिए। मंजुल हमे अक्षर धाम तक छोड़कर आया। गाजियाबाद
मंनू और रिंकू के पास खाना खाकर हम बिजनौर के लिए चल दिए और रात साढ़ दस बजे घर
आए।
अमेरिका जाने के लिए पहले एक दिन में वीजा की
सारी प्रक्रिया पूरी हो जाती थी। सबेरे फिंगर प्रिंट लिये जाते उसके बाद इंटरव्यू
और शाम को पासपोर्ट मिला जाता। किंतु कुद माह पूर्व उसने यह प्रक्रिया बदल दी अब
औसतन तीन दिन लगने लगे। पहले दिन फिंगर प्रिंट दिए, दूसरे
दिन इंटरव्यू, तीसरे दिन पासपोर्ट लेना। बहुत लंबी और कष्ठकर
प्रक्रिया है यह।
युवा जो अमेरिका जाकर वसना चाहते है उनकी भीड़
रोकने को तो यह ठीक है किंतु इन सीनियर सिटीजन के लिए नहीं। जिन्होंने पूरी उम्र
भारत में गुजार दी। उनके लिए अमेरिका जाना मजबूरी होगा आवश्यकता नहीं। हमारे वंश
में नया अवतार आने वाला है। ऐसे समय पर अंशुल और शिल्पी के पास शिल्पी को संभालने
के लिए निर्मल का होना आवश्यक है। दूसरे महिलाओं की विशेषता होती है कि वह अकेले
बच्चों में पूरा समय निकाल देती है। किसी जोड में पति के निधन पर महिला अकेलापन
नहीं महसूस करती वह, परिवार की जिम्मेदारी में लगी रहती है। परिवार
के छोटे बच्चों को संभाल कर समय पास कर देती है। संकट होता है पुरूष को। अकेले
रहने पर वह अपने को असहाय, अकेला महसूस करता है। बच्चों में वह
घुल मिल नहीं पाता किसी से अपनी बात कह नहीं सकता। सो अकेला ही अपने में घुटता
रहता है।
निर्मल के लिए अंशुल और शिल्पी के पास रहने का
कारण होगा किंतु मेरे पास नहीं। क्योंकि में और निर्मल कभी खाली अकेले नहीं रहे।
इसलिए मुझे भी उसके साथ जाना होगा। एक दो बार निर्मल अपने मायके गई या कही
रिश्तदारी में तो तबियत खराब हो गई। एक बार मंजुल के नाक के आप्रेशन के दौरान वह
उसके पास नोयडा में थी। आप्रेशन के एक दिन बाद में बिजनौर आ गया था।
दो तीन दिन बाद मेरी तबियत खराब हो गई। दुपहर
में कलेक्ट्रेट में लगा कि रात काटना संभव नहीं होगा। बिजनौर में रात में डाक्टर
नर्सिग होम में मिलते नहीं सो में शाम को .. को चला गया और डॉक्टर से इंजेक्षन आदि
लगवाकर दवाईलेकर बिजनौर आया था।
अंशुल शिल्पी यह जानते है, इसलिए
वह मुझे यहां अकेला नहीं छोडग़े हालांकि मैने कहा भी नहीं है, किंतु
पांच माह अमेरिका में कैसे कटेगे। हालांकि कंपनी की ओर से कोई मनाही नहीं है,
यही मेरे तनाव का विषय है खैर अब....और वहां बच्चों को हमारी जरूरत
है, तो जाना तो है ही, देखना है कैसे समय कटेगा। एक मन में
दुबिधा और थी हम अलग ................................................
२८ दिसंबर २०१२
अमेरिका यात्रा के टिकट आ गए, २७
जनवरी की रात ११ बजकर ३५ मिनट पर यूनाइटेड एयर लाइंस से रवानगी है। १७ जून को
वापसी होग।
वीजा का तनाव खत्म हो गया अब नई चिंता है २७
जनवरी को ११ बजकर ३५ मिनट पर चलकर १५ घंटे ३५ मिनट .... पहुंचेगे। वहां लगभग साढ़े
चार घंटे रूकर हमे सिनसिनाटी के लिए दूसरी प्लाइट पकडऩी है। वह एक घंटा बीस मिटन
में सिनसिनाटी पहुंचा देगी।
कैसे होगा इतनी लंबी यात्रा में नेवार्क
एयरपोर्ट पर क्या होगा। लगेज कहां मिलेगा। बहुत सारे सवाल मन में है। २७ जनवरी को
प्राय की...होता है। क्या यात्रा समय से निकल पाएगी। न्यूयार्क में मौसम खराब होने
पर रूकना पड़ा तो भोजन आदि का कैसे होगा। शाकाहारी भोजन कैसे मिलेगा। बहुत सारे
सवाल मने में है? कुछ कहा नहीं जा सकता। उत्तर समय स्वयं दे
देगा।
यह भी एक नया तर्जुबा है प्राय: हम घर से अकेले
निकलने के आदि नहीं है, अब जब निकला पड़ा तो उसे देखेगे। बच्चों के
बताए अनुसार सामारन सहेजना शुरू कर दिया है। बैग का बजन २३ किलो होना चाहिए। इसी
हिसाब से सामान रखना है।यहां बचे कार्य जल्दी निपटाने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी
है। सब की जल्दी है।
साढ़े चार माह को जाना था तो दवाई भी चाहिए।
डा. श्रीश, दीपक और कैलाश यात्रा की.... से प्राय जरूरत की
दवाई ले ली। क्योंकि अमेरिका में सब सस्ता है वस उपचार बहुत महंगा है। यहां आने
वाले को डॉक्टर सा ना मिल वाएं। दवाई कस्टम पर चैक हो सकती है तो डा.श्रीश से
उपचार लिखवाया। अंशुल ने कहा था कि अपनी दवा लगभग छह माह लेकर आना ही। इस डर से
कहीं एयरपोर्ट पर दवाई न निकलवा दे। अपनी ब्लड प्रेशरर की दवाई निर्मल के पेपर पर
ही लिखवा दी। ..... ने लिए .....में श्रीश से अपना मेडिकल फिटनेस भी तैयार करा
लिया।
सुविधा का दुरूपयोग नहीं करना चाहिए हम शिल्पी
के लिए कुछ शूट और साड़ी अमेरिका ले जाना चाहते है सूट के कपड़े ले लिए, साड़ी
ले ली। सूट और साड़ी के ब्लाज का साइज
क.... यह तो नहीं। क्योकि शिल्पी अभी गर्भ
से है, फरवरी में डिलीवरी है। और और डिलीवरी के बाद बॉडी स्ट्रक्चर में
परिर्वतन आना है इसलिए क्या नाप हो। यह समझ नहीं आ रहा था। मैने अंशुल से स्काइप
पर बात करते मैने कहा कि वर्तमान साइज से थोड़ा बढ़ा कर यहां सिला लेते है। वहां
जाकर ठीकर हो जाएगा। अंशुल ने बताया कि सिलाई मशीन तो है नही सो मम्मी कैसे
सिलेगी। मैने कहा कि अमेरिका में तो व्यवस्था है कि सामान खरीद लो पसंद न आए तो एक
माह में लौटा दो पूरा पैसा मिल जाता है। सो सिलाई मशीन खरीद लेंगे। और कपड़े ठीक
करउसे वापस कर देगे।
बेटे की बात ने मेरी आंख खोल दी। कहा पापा
उपभोक्ता अधिकार का दुरूपयोग ठीक नही। ऐसा सभी करने लगे तो सरकार नियम बदल देगी।
नुकसान तो फिर हमारा होगा। मैं चुप रह गया। जान गया कि बच्चे मुझसे ज्यादा समझदार
और जिम्मेदार हो गए है। हम हिंदुस्तानी अपने अधिकार की बात करते है। यदि कत्र्तव्य
की भी बात करने लगे तो कैसा रहेगा। देश के हालात पूरे बदल जाएगा। यदि देश से
भ्रष्टाचार और टैक्स चोरी खत्म हो जाए तो भारत अमेरिका से भी आगे जा सकता है। इसमे
कोई संदेह नहीं।
२८ जनवरी २०१३
और हम अमेरिका आ गए एक नई दुनिया में, मशीनों
की दुनिया में कही कहीं खो कर रह गया है।
सफर की तैयारी के लिए नैवाक पहुंचने पर अंशल से
बात करने के लिए मैन ... का इंटरनेशनल नंबर ले लिया है। अंंशुल ने मेरे मोबाइल में
टाकटोन मंजुल से कहकर डलवा दिया है ताकि नेवार्क पहुुंच कर हम उससे बात कर सके और
वह बता से कि यहां क्या करना है। टिकट जब आए थे तो मैने दिल्ली से पहुंचने की जगह
न्ययार्क पढ़ी। मेरी आदत हे कि मैं ज्यादा ध्यान नहीं देता। नेवार्क को मैने
न्यूयार्क पढ़ा जबकि यह नेवार्क है। मैने न्यूयार्क एयरपोर्अ को .....तो चिंता हुई
क्योंकि वहां कई टार्मेनल है और काफी दूर-दूर है। एक टार्मेनलसे दूसरे टार्मेनल को
जाने कलए ट्रेन चलती है। मैं न्यूयार्क एयरपोर्ट का गूगल पर मैप देख ही रहा था
उसकी बिल्डिंग का अध्ययन कर ही रहा था कि .... है इसी दौरान अंशुल ने बताया कि
आपको न्यूयार्क नहीं नेवार्क पहुंचना है। वहां से दूसरी फ्लाइट लेनी है। अब मैने
नेवार्क को देखा। यहां तीन टार्मेनल है एक और दो तीसरा वीआईपी है। एक इंटरनेशनल है,...
कुछ तनाव खत्म हुआ, सोचा ज्यादा परेशानी नहीं होगी। एक से
दो पर ही तो जाना होगा। हमे नेवार्क एयरपोर्ट का चित्र भेज दिया। उसने बता दिया
कि आप कहंा उतरेंगे। कहां कहां होते हुए
पहुंचेगे। अंशुल ने बिल्डिंग का घूम और ७१ नंबर गेट दिखाया। बताया कि यहां से
एयरपोर्अ बसु चलता है यह आपको टार्मेनल दो पर पहुचा देगा वहां से आपको दूसरा प्लेन
मिलेगा।
उसने देखकर इपार्ल सैंडविच का स्टोर बताया और
वहां से इसकी तीन उत्पाद शाकाहारी है। उनके नाम भी हमें भेज दिए ताकि वह खरीद कर
रखा सके। यात्रा पर निकलने से पूर्व उसने हमें कन्फर्म टिकट और मोडीक्लेम
सर्टिफिकेट भेज दिया।
यात्रा से पूर्व प्लने में अलग अलग जाने वाले
बैग में सामान रखना शुरू कर दिया। वहां के लिए बैग में सामान भरकर पहली बार तोला
तो मेरे बैग का बजन १७ किलो और निर्मल के बैग का वजन १९ किलो हुआ। निर्मल के बैग
में उसके कपड़े ज्यादा थे। शिल्पी के यहां का सामान अभी नही आया था। सोचा चलो
इसमें कुछ और नहीं रखेगे। अभी शिल्पी के यहां से भी सामान आना है। कुछ मिठाई लेनी
है ... में प्लेन में अगल जाने वाले बैंग में रखा जाएगा।
अंशुल ने कहा कि पार्टी आम में जाना है,
सो एक जोडी लेदर का जूता अपेन लिए लेकर आना। अंशुल पहले बार अमेरिका
गया था तो वह नया जूता और कई बॉडी स्प्रे ले गया था। फ्लाइट में रास्ते में उसके
बैग से नया जूता एवं कुछ बॉडी स्प्रे गायब हो गया था। यह देख हमने तय किया कि दो
बैग है, दोनों में एक एक जूता रखा जाए ताकि दोनो जूतो देखकर कोई चुरा न सके।
शिल्पी ने दो जोडी चप्पल मंगाए थे। यही सोच अलग अलग तरहा के एक एक चप्पल एक बैग
में और दूसरी तरहा का दूसरे बैंग में चप्पल रखी। दवाईयां दोनों बैग में रखी। मैने
मन में सोचा कि अमेरिका प्रवास के दौरान अपनी मैमोरी लिखूंगा। सुल्ताना पर काम
अधूरा पड़ा है। उसे पूरा करना, खाली समय में खूब पढ़ंूगा।
अंशुल ने बताया कि बेबी के लिए राई का तकिया
बना लाना। मैंने कहा कि ....में आता है। सीड़ ले जाने की अनुमति नहीं है। शिल्पी
ने कहा तकिया बना लाना। राई यहीं मिल जाती है। तकिए में भर लेगे। मैने अंशुल से
कहा कि ... डालकर कार्ड देता है। उसने कहा पापा हम है ना क्या करोगे। उसने अब मैं
कैसे बताऊं कि कुछ खरीदने का हमारा मन होगा तो क्या हम अंशुल से कहें। दूसरे हमारे
परिवार में नया सदस्य आना है ऐसे में बच्चा और शिल्पी का दादा दादी की ओर से कुछ
दिया जाना चाहिए। ऐसे में क्या अंशुल से खरीदवाएं। यदि उससे खरीद वाया जाए तो
शिल्पी क्या सोचेगी। हमारे पैसे से हमें ही गिफ्ट कर रहे है।
निर्मल बच्चे के लिए कपड़े लेना चाहती थी। मैने
मना किया अमेरिका का माहौल कुछ और है, हमारी कुछ और,
हम बच्चे को रंग बिरंगे चटख रंग के कपडे पहनाते है। अमेरिका में
हल्के कलर के। इसलिए हमारे खरीदे कपड़े उन्हें समझ नहीं आएगे। एक दिन ये बात हमने
अंशुल को बताई भी उसने कहा कि यहां की छोडिए आपका जो मन हो ले आइए।फिर भी मैने
निर्मल को एक दो से ज्यादा बेबी के कपड़े नहीं लेने दिए।
.... चाहते भी मैने अपनी ओर से निर्मल के नाम
के एक एक हजार डालर के ....बैंक के दो डेबिट कार्ड खरीद लिए।
अंशुल ने हमें जरूरी पपत्र भेज दिए। भारतीय और
अमेरिकी एयरपोर्ट पर भरे जाने वाले आवेदन पत्र भी। उन्हें भरना भी बता दिया। कस्टम
पर जमा किए जाने वाले नीला फार्म में हमें ...... फल, वनस्पति,
सीडस, खाने का सामान आदि तो .................शिल्पी
से सलाह कर अंशुल ने कह दिया कि नो पर टिक कर देना हमें मिठाईयां ले जानी थी,
इसका फार्म में नो करने के बाद यदि कस्टम पर पकड़ी गई तो क्या होगा।
इमने डा.श्रीश से पूछा उसने कहा फूड पर टिक करना। चाहे तो देख लोग।
खैर कई दिन पूर्व बैग लगए गए थे किंतु शिल्पी
के यहां से सामान आने पर उनमें फिर फेरबदल हुई। दवाई ज्यादा होने के कारण दोनों
बैंग में अलग अलग रखी गई। मंजुल २५ को आ गया था। उसने तैयारी में मद्द की। सामान
पैक कराए और अंशुल द्वारा भेजे फार्म मुझसे भरवाए ये भरे फार्म मैने निर्मल के
पर्स में रख दिए ताकि इन्हें देखकर भरा जा सके। २६ को शिल्पी की मम्मी ने शाम को
खाने का कार्यक्रम रखा था। किंतु मैने मना कर दिया क्योंकि मीनू के यहां भजन था।
फिर उन्होंने कहा कि सेबेरे नाश्ता तैयार कर देगी...हुआ कि वह छोले पूरी बना कर
भेज देगी।
१२ बजे निकलना था। जल्दी नहीं थी। आराम से आठ
बजे उठे। दफ्तर से साथी मिलने आने लगे। नाश्ता किया ही था कि शिल्पी की मम्मी पापा
भी आ गए। उनके सामान में एक खरबजे के बीज का पैकेट था। हमारे बताने पर अंशुल ने न
लाने को कह दिया। अब हमने बैग से निकाल दिया था। सौरव के यहां से भी मिठाई आ गई।
निर्मल ने जल्दी जल्दी में उन्हें पैक किया।
अंशुल ने बताया था कि एक दो कपड़े के नीचे मिठाई के पैकेट रखना, कस्टम
वाला कहे तो दिखा देना। सो कपड़ो में नीचे रखा सामान फिर ऊपर किया। इस तरह एक बज
गया था। नीरज का छोडऩा था सो उसका का हिसाब मैने कर दिया। अंशुल के ससुर को कह
दिया कि कार की चाबी ले ले और ...... पार्क की है ताकि आपको सुविधा रहे।
१२ बजे चलकर कुछ देर मन्नू के यहां रूककर हम
एयरपोर्ट को निकल लिए। रिंकू को भी हमने साथ ले लिया। कार से सामान उतारते समय
मेरे बैंग की चेन फ्री हो गई। सामान मंजुल के बैग में रखा। उसने कहा कि यह बैग तो
वह बिजनौर आते समय अपने एक पार्टनर का मांग लाया था। हमने कहा कि मजबूरी है,
उसे नया बैग दिलवा देना।
लगभग साढे आठ बजे हम एयरपोर्ट में फ्लाइट से
तीन घंटे पूर्व प्रवेश कर गए। यह सोचकर कि पहला मामला है, कही
समस्य हुई तो समय पर मामला निपट जाएगा।
यूनाइटेड एयरलाइंस के स्टाफ के क्यों जा रहे हो,
अमेरिका में कौन है,किसी ने गिफ्ट तो नहीं दिया, आदि
प्रश्नो से गुजरते स्टाफ को लगेज सौप दिया। हाथ के बैग के ....लेकर उनमे लगा लिए।
यहीं से इमीग्रेशन फार्म मिल गए। अंशुल मई में भारत आया था तो अपनी मां को ७० डालर
दे गया था। बाद में बातचीत में उसने कहा कि मौसम खराब होने पर फ्लाइट लेट हुई तो
एयरपोर्ट पर खाना पड़ सकता है। किसी से वह १०० डालर और भिजवा देगा। हमारे पास ७०
डालर थे फिर भी यहां हमने १०० डालर और ले लिए। अभी भी हमारे पास लगभग २० हजार रूपए
की भारतीय मुद्रा थी। डालर लेते ही हमने इमीग्रेशन के फार्म भरे। यहां से
सिक्यूरिटी चेक कराकर कसम श्री बाजार पहुचे।
यह बहुत खूबसूरत बाजार है। इसके बीच से होते
फ्लाइट तक पहुंचना होता है। प्रत्येक एयरलाइंस से अपने अपने गेट बना रखे है। इन
गेट में शीशे के बडे बडे गेट हॉल बने है। एयरलाइंस कर्मी अपने यात्रियों के वोडिग
पास लेकर अंदर ले जाते है। यहां पड़ी कुर्सियों पर यात्री फ्लाइट के समय तक बैठे
रहते है। प्लेट न.गेट पर लग जाने पर स्टाफ यात्रियों को प्लेन तक ले जाते है। डेमोस्टिक
फ्लाइट में प्लेन तक प्राय: यात्रियों को बस से ले जाया जाता है। किंतु
अंतराष्ट्रीय उड़ान में प्लेन के खड़ी होने की जगह ....के खूबसूरत रास्ते बने होते
है। सुरंग की तरह। इनसे सीधे प्लेन में अंदर पहुंच जाते है। हम प्लेन में प्रवेश
करते है। अंशुल ने हमारी सीट पहले ही निर्धारित करा दी है। प्लेन बहुत खूबसूरत है।
आगे प्रथम और सेकेंड क्लास के यात्रियों के बैठने की सुविधाएं है। बड़ी कुर्सिया
सामने बड़े टीवी।
हमारे बिजनेस क्लास में एक रो में तीन तीन सीट
की है। ....और एक तीन सीटी की रा बीच में। हमारी बीच की दो में एक साइड की सीट है।
हम सीट के ऊपर सामान रखने की जगह में हमें अपने हाथ के बैग रख कर सीट पर बैठ जाते
है। मैं बार बार उठता हूं इसलिए मैने किनारे की सीट ली है। निर्मला बीच में है
तीसरी सीट पर एक अमेरिकन लड़की है। उम्र होगी २५-२६ साल, साइज आम
पतली छरहरी। सीट पर पहुंचने पर वह हमारी ओर देखकर मुस्कराती है और फिर कान में लगे
स्पीकर फोन से गाने सुनने लग जाती है। अंशल ने बताया कि अमेरिकन आपको देखकर स्माइल
देगे या हाय हेलो करेंगे। आपको जाने बिना ही। किंतु भारतीय ऐसा नहीं करते। वह यह
भी जानते है कि सामने से आने वाला भारतीय है, उसे नजर
अंदाज कर आगे बढ़ जाते है।
मेरे दाए हाथ की पंक्ति में चश्मा लगाएं एक
युवक किनारे की सीट पर बैठा है। उसने सीट पर आते ही सामने की सीट में लगा टीवी ऑन
कर लिया और कानपर स्पीकर लगा कर पिक्चर देखनी शुरू कर दी। यात्रियों के सवार हो
जाने पर लगी टीवी स्क्रीन पर सुरक्षा सव की सूचनाएं आने लगती है।
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