अंकल सेम की दुनिया भाग एक

 

अंशुल और उसकी पत्नी शिल्पी अमेरिका के मीमेंसवर्ग शहर में रहते है। शिल्पी गर्भवती है। ऐसे में सास को पुत्र वधु के पास होना चाहिए। पुत्रवधु जब परिवार के नए सदस्य को जन्म दे तो परिवार की मुखिया सास की जिम्मेदारी बनती है कि वह पुत्र वधु का ध्यान रखे। उसकी सेवा करे।

हम भारतीय भी अजीब है। अपने बच्चों को पालने पोसते है बड़ा करके जीवन यापन करने योग्य बनाते है। इसलिए कि हमारे  अपने माता पिता के हमें पालपोसकर योग्य बनना है। हमें योग्य  बनाने का  हम पर किए कर्ज के त्रण को चुका सके। दूसर इसलिए कि बड़े होकर बच्चे हमारे बुढ़ापे का सहारा बने। बचपन में हमने जिन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया था। बुढ़ापे में वह हमारी मदद करे। हमारा सहारा बने।

परिवार में नए सदस्य के आने की खुशी है बैचेनी है उसका स्वागत करने की। अंशुल पहले चाहता था कि हम सात फरवीर तक आए क्योंकि डिलीवरी २० फरवरी के आप पास हुई।  अब लगभग दूसरे दिन बात होती है। अंशुल कहता है कि साथियों का सुझाव है कि मम्मी पापा को हरहाल में जनवरी के लास्ट में बुला ले। फररवी का कुछ पता नहीं जाने कब जरूरत पड़ जाए।

और तैयारी शुरू हो जाती है वीजा लेने की। देवेन्द्र गुप्ता झालू के रहने वाले है वे कैनेडा सेटल हो गए। .. समीर कॉम्पलेक्स में रहते है और होंडा मोटर कंपनी में कार्यरत है बेटी सपना फ्लोरोडा में एक कॉलेज की लेक्चरार है देवेन्द्र गुप्ता के पिता डा ब्रजभूषण गुप्ता झालू टाउन एरिया के चेयरमैन रहे है। मेरे चाचा राजेन्द्र शर्मा डा.व्रजभूषण शर्मा गुप्ता के पास १६-१७ साल कंपाउडर रहे। उसके बाद अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी।

हमारे परिवार का इलाज डा.गुप्ता करते थे। और उनके परिवार का इलाज मेरे दादा हकीम राम किशन जी। मेरे दादा वैद्य थे। हमारे परिवार में पीडिय़ो से वैद्यक होती थी। देवेन्द्र गुप्ता बचपन में बीमार हुए। परिवार वालो ने मान लिया मर गए। और टोकरे में अंतिम संस्कार के लिए रख दिया। हकीम जी को बुलाया गया। उन्होंने देखा और दवाई दी देवेन्द्र ठीक हो गए। वह कहते है कि में हकीम जी की बदौलत जिंदा हूं। दादा राम किशन लाल जी की बहुत प्रसिद्धि थी और दूर दूर तक इलाज को जाते थे। सन ७२ के आसपास दशहरा से अगले दिन उनका निधन हुआ।

 

१९ दिसबंर २०१२ गाजियाबाद।

पिछले एक माह से अमेरिका जाने के लिए वीजा लेने की तैयारी चल रही है। बहुत कष्ठप्रद और मानसिक तनाव का कार्य है। चाहते है कि अमेरिका जैसा भव्य देश घूम लिया जाए। मित्रगण कहते है कि अमेरिका एक नई दूनिया है झालू के मूल निवास और देवेन्द्र गुप्ता कहते है कि भारत के मुकाबले यहा सब कुछ अलग है। मन में घूमने का बहुत उत्साह है। बेटा अंशुल कई बार कह चुका है। अब उस का... ज्यादा है। वैसे शिल्पी की डिलीवरी फरवरी के आखिर में होनी है हम चाहते है कि यह सब हमारे सामने हो हमारे सामने हमारे वेश में नया शिशु आए।

अमेरिका के लिए अब वीजा हदेने में परिर्वतन हो गया है यह प्रक्रिया दो दिन की कर दी गई है। पहले दिन फिंगर प्रिंट लिए जाने है और दूसर दिन इंटव्यू होना है। पहले ये कार्य एक दिन में पूरे हो जाते था।

आज शाम हमारे फिंगर पिं्रट लिए जाने थे इसका समसय ढाई बजे निर्धारित था। हम कल शाम बिजनौर से चलकर रात सवादस बजे गाजियाबाद आ गए थे। रात मन्नू के पास रूके। रिंकू ने अवकाश ले लिया थो वह हमारे साथ निकले। हम लगभग दस बजे चले। मंजुल के पास पहुंचे। दिल्ली में गर्मी समझ इनर पहन कर नही गए थे। मंजुल के भवन के बाहर कार से उतरे तो पला चला कि यहां ठंड ज्यादा है हवा तेज है। मंजु थर्ड फ्लोर पर रह रहा है। जीना इस प्रकार बना है कि गेट के अंदर जीना है। सामने के भवन में कोई रहता है। इसी तरह सेकेंड भवन फ्लोर तक गाउंड फ्लोर और प्रथम फ्लोर पर परिवार रहते है। घूम लेने के लिए वह जीने के सामने था गेट के बाहर बैठ जाते है।

मंजुल के रूम के बाहर एवं पलंग है। उसके आगे गैलरी में रसोई एवं बाथरूम तथा शौचालय  के आगे कमरे में फर्श पर जो गद्दे हुए है। इन पर एक पर मंजुल ओर दसूरे पर इन का तीसरा साथी रहता है अंदर के कमरे में कोने में एक्सरसाइज करने के उपकरण देख कर अच्छा लगा कि चलो पढाई के साथ यह स्वास्थ्य का भी ध्यान रखेगे। यहां कुछ देर रूके और इंटरव्यू के प्रथम चरण के लिए हम नेहरू पैलेस पहुंए गए। नेहरू पैलेस के होटल के बाहर कार पार्क की। देखा कि सामने सिक्यूरिटी चैक है वीजा वाले यहां से जा रहे थे क्योंकि एक बजने वाला था। हमे भी भोजन करना था, सो नेहरू पैलेस की ओर चल दिए। यहां कम्प्यूटर का बडा मार्केट है किंतु हवा तेज थी ठंड ज्यादा महसूस हो रही थी। मैं जेकेट की चेन लगान चाहता था किंतु फिर वह नहीं लगाई। आगे बढ़ते गए निर्मल के लिए एक जैकेट ली। मैं चाहता था कि वह पहने किंतु उन्होंने नही पहनी वहीं हमने राजमा और चावल खाए। ड्राइवर नीरज के लिए छोला भटूरा पैकिंग कराया कार पर आए तो डेढ़ बजने को था। हम ने होटल में एंट्री की। सर्च के बाद अंदर पहुंचे वहां भी लाइन लगी थी। पासपोर्ट एवं कन्फर्म लैटर लेकर अंदर जाने दिया। वहां भी सर्च हुई। काउंटर पर पासपोर्ट दिए वहां की प्रक्रिया और एक ओर व्यक्ति द्वारा चैकिंग के बाद अंदर हाल में पहुंचे यहां ४० के आसपास कुर्सी पड़ी थी। ९-१० काउंटर फिगर प्रिंट के लिए था। उस प्रत्येक काउंटर पर कैमरे लगे थे। कैमरे से फोटो खींचकर और फिंगर प्रिंट लेकर हमे पांच मिनट बाद फ्री कर दिया गया। हम दो बजे बाहर आ गए। रिंकू नीरज कार के पास नहीं था। फोन किया तो वह नेहरू पैलेस के बाजार में थे। हम वहां गए कुछ खरीददारी की। लौटे तो पार्किग की जगह से कार गायब थी। यहां कार पाक करने वाले से पूछता तो बताया कि पुलिस वाले ले गए होगे। जहां उसने बताया थो वहां पहुंचे तो पुलिस ने दूसरी जगह बता दी। वहां से तीसरी जगह बताई गई। हमे लगभग दो किलोमीटर पैदल घूमने पड़ा तब वहां पहुंचे जहां हमारी गाड़ी खड़ी थी। हमे बताया गया कि नो पार्किग में थी इसलिए गाड़ी क्रेन उठा लाई ३००रू. जुर्माना दो, जुर्माना दिया। हमने गाड़ी ली और और वापस गाजियाबाद के लिए चल दिए।

हमारी गाड़ी सड़क में काफी पीछे पाक की हुई थी उसके आस पास दो कार और खड़ी थी फिर भी हमारी कार उठा ली गई। जगह जगह घुमाने और दो किमी का चक्कर कटाने में लगा कि यहां की पुलिस की पार्किक वालो से मिली भगत है। जान बूझकर परेशान किया जाता है। उनका निशाना ज्यादातर वह गाडियां होती है जो दिल्ली के बाहर की होती है। और पार्किग का पैसा नहीं देती है। जहां हमारी कार खड़ी थी, वह नो पार्किग एरिया किंतु वहां सौ गाडिय़ा खड़ी थी।

वैसे मेरा मानना यह कि दिल्ली पुलिस के लिए दिल्ली से बाहर की गाड़ी वसूली का अच्छा माध्यम है। सड़क किनारे आप गाड़ी रोक कर कुछ मिनट के लिए रूकेगे तो दिल्ली पुलिस नौ पार्किग बताकर चालान के १०० रूपए जरूर वसूल लेगी। हालांकि चालान की जगह दूर दूर तक नो पार्किग की कोई सूचना पट्ट नहीं होगी। लौट रहे थे कि एक जगह पुलिस ने गाड़ी फिर रोक ली और फिल्म लगी कह कर चालान काटने लग। बामुश्किल पांच सौ रूपए वसूल कर पीछा छुड़ाकर हमने आगे चालान से बचने का उपाए पूछा तो बोला शीश उतारकर बैठ जाइए। वैसा हमने भी किया भी।

गाजियाबाद आकर सबसे पहले मैने कार के शीशो पर लगी फिल्म उतरवाई। सबेरे साढ़े दस बजे अमेरिकन दूतावास में इंटरव्यू है तो हुआ कि सबेरे साढ़े छह तक हम गाजियाबाद से निकल जाएगे।

मंजुल करोल बाग में रास्ते पर मिल जाएगा और वह से हम चाणक्या पुरोस्मित अमेरिकन दूतावास पहुुंच जाएगा। दूतावास के बाहर खडे होकर इंतजार करना जयादा ठीक है, देर से पहुंचने के मुकाबले।

वैसे पिछले १५ दिन बहुत तनावपूर्ण रहे है। वीजा के पेपर तैयार कराने लिए। बिजनौर के एक साथी हाल में अमेरिका से लौटे है। उन्होंने बताया कि आप अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा तैयार करा ले। अंशुल ने बताया कि दूतावास आपके एकाउंट में जमा रकम देखना चाहते है वे चाहते है कि आप के पास पिछले छह माह में एकाउंट में छह लाख के करीब रूपया होना चाहिए। हमने एकाउंट खोजे तो पाया कि हमारे खातों में सवा चार लाख के करीब रूपया है।

मैने पढ़ा तो पाया कि अमेरिका का वीजा लेने के लिए एबसी के अनुसार आपके फेवर में तीन चीज होनी चाहिए। आपकी आयु ६० वर्ष से ज्यादा हो, आपके देश में आपका मकान हो और पिछले पांच साल में आप विदेश की यात्रा कर चुके हो। ये तीनों शर्त हमारे फेवर में थी सो हम निश्चित हो गए कि सारा ईश्वर कर रहे है। उधर अंशुल ने कहा कि उसने अपने कुछ पेपर भेजे है उनसे आने पर कार्रवाई करेगे।

कई बार फोटो खिंचवाने पड़े। मेरे फोटो देख कर अंशुल ने ठीक बता दिया। .... पहली बार मेरे फोटो में चश्मे से फ्लैश रिफलेक्टर हुई। उससे आधी आंख दिखाई नहीं दी। दोबारा बनवाया तो दुकान वाले ने कुछ टर्चिग कर दी उसे अंशुल ने मना कर दिया। तीसरी बार फोटो खिंचवाए साफ्ट कॉपी उसे भेज दी। पास्पोर्ट साईज के दो २०-२० फोटो हमने बनवाए थे क्योंकि बाद में भी जरूरत पडती रहती है। अंशुल ने कहा कि इनका साइज कम है दो-दो इंज का बनवाओ, ये तैयार कराए। बैंक से स्टेटमेंट निकलवाएं। बताया गया कि आप प्रोपर्टी के स्टेटमेंट बनावाओं। अतुल विश्नोई यहां नक्षा बनाते व वैल्यूवशेन करते है। उनकी पत्नी रचना सिंह दोनों बहुत अच्छे है। उन्होंने मिल कर वैल्यूवेशन निकाली।

डा.नवनीत गर्ग के भाई संजीव गर्ग हाल में अमेरिका गए थे। उन्होंने बताया कि उन्होंने तो एक ट्रेवल एजेंट से तैयारी कराई। उसके बताने पर ही आवेदन दिया। ट्रेवल एजेंट को अंशुल ने मना कर दिया।.......

अंशुल ने कहा कि फीस एक साथ बैंक में जमा हो सकती है वहां प्रबंधक से पता कर लेना कि वे जमा करते रहे है या नहीं। स्वयं ही जाना क्योंकि एक बार फीस जमा हो गई तो वापस नहीं मिलती। मैं गया मैनेजर एक त्यागी है उन्होंने कहा कि हम फीस जमा कराते रहत तो है उनकी अंशुल से बात करा दी। अंशुल के सहमत होने पर फीस जमा हो गइ्र।

अमरिकी अधिकारी यह सबूत चाहते है कि आप उनके पास जाकर बसोगे तो नहीं। वापस लौटने का क्या इरादा है। यह बताने के लिए कि हमारा भारत में प्लाट और घर है उसकी वैल्यू निकनवाई। अंशुल ने बताया कि ओरिजनल बैनामे साथ ले जाने है फीस जमा होने के बाद अंशुल ने पूछ कर फार्म भर दिया। इंटरव्यू की डेट इसलिए नहीं ले पाए थे कि अंशुल ने अमेरिका से कुछ पेपर कौरियर किए थे। वे सभी नहीं आए थे।

इसी दौरान इंटरव्यूके बारे में पढ़ते बोल कि मकान के अंदर से फोटो खिचवाकर ले जाना वे कई बार मांग लेते है। सो मकान के फोटो खिंचवाए। फिर एक दिन बोला कि अपने पुराने पोसपोर्ट भी ले जाना है, क्योंकि वर्तमान पासपोर्ट में उसका नंबर दिया है। तब मैं चौका कि पुराना पासपोर्ट तो कालेज के प्रमाण पत्रों में दिए अशोक कुमार शर्मा के नाम पर बना है।

दरअसल मैने पढ़ाई के दौरान ही कविताएं लिखने े कारण अपने नाम अशोक के आगे मधुप लगा लिया। घर के बैनामे, रिवाल्वर के लाईसेंस आदि में यही नाम है। पहला पासपोर्ट जिस एजेंट को बनाने को दिया उसने कह दिया था कि अशोक मधुप के नाम से बनवाएं किंतु उस वेवकूफ न फार्म में स्कूल का नाम अशोक कुमार शर्मा पिता अशोक का नाम ओम प्रकाश कर दिया। इस नाम से पासपोर्ट बनकर आया। जन्म स्थल मौलवियान झालू बिजनौर लिखवाया था। जबकि पासपोर्ट में मोलवियान बिजनौर हो गया।

दूसरे में जन्म स्थान बिजनौर नाम अशोक मधुप औरपिता का नाम ओमप्रकाश रहा। अब इस बात को लेकर बहुत तनाव पैदा हो गया कि पूर्व नाम का क्या होगा। थोडी देर के लिए तो संकट पैदा हो गया। अंशुल से इसी पर बात हो रही थी। उसने मेरे तनाव को देखकर कहा कि पापा चिता की बात नहीं है फिंगर प्रिंट देन जाने तक परिर्वतन हो सकता है।

उसने कहा कि मैं रात में आवेदन पत्र ठीक कर भेज दूंगा आप देख लेना। उसने मेरे नाम के साथ ही दूसरे कालम में कहा कोई और नाम भी प्रयाग किया है। अशोक कुमार शर्मा कर दिया।

एक कालम यह भी था कि आपने पिछले पांच साल में विदेश की यात्रा कि अंशुल ने नेपाल कर दिया। दरअसल अमेरिकी दूतावस की साइड पर दिया था। कि वीजा लेने के लिए तीन चीज आपके पक्ष में है एक आपकी आयु ६० वर्ष से ज्यादा हो, दो आपके देश में आपका मकान हो और तीसरी पिछले पांच साल में आप विदेश की यात्रा कर चुके हो।

अंशुल के दोबारा भरे आवेदन पत्र में चाहता था कि नेपाल के साथ साथ तिब्बत चीन की यात्रा भी बढ़ जाए किंतु अंशुल बोला तिब्बत कोइ कंट्री ही नहीं है। एक हमारे पासपोर्ट पर नेपाल के तिब्बत के साथ बोर्डर के डियाचर की ३० मई की और एटावल को ९ जून की मोहर लगी थी। मैने उससे इसके बारे में भी बताया किंतु मना कर दिया। कि फार्म सममिट हो गया। अंशुल के पेपर मिल गए। उसने हमारे इंटरव्यू की डेट ले ली। १९ की शाम ढाई बजे नेहरू पैलेस के अमेरिकन सेंटर मेंंंं फिंगर प्रिंट देने का समय मिला। दूसरे दिन साढ़ दस बजे चाणक्यपुरी में इंटरव्यू का।

अंशुलने पेपर की समरी बनाकर भेजी थी। उससे हमने मेन सीरियल पर हमने पेपर लगा लिए। एक फोल्डर में उसके कहने पर हमने दो दो एक एक फोटो पासपोर्ट आवेदन करने की रशीद, बैक में धन जमा करने के बाउचर और अपाइंटमेंट लेटर का प्रिंट रखा।

मेरे एपाइंटमनेट लेटर में दोनों के नाम थे किंतु अंशुल ने कहा कि मम्मी का अलग से एपाइंटमेंट लेटर रख लेना। मांगे तब दिखाना अन्यथा नही।

अब अंशुल ने बताया कि नाम बदलने का एफेडफिट भी चाहिए। मैन कहा कि में पासपोर्ट बनवाने को नाम परिर्वतन किया था, अब वह कहां मिलेगा उसने कहा कि पुराना ना मिला तो नया बनवा लेना।

मैं कलेक्ट्रेट नया एफेडेफिट गया कि टाइपिस्ट के पास काम ज्यादा था, घर आकर खोजा तो पासपोर्ट बनवाने के समय भेजी एफेडेफिट की छाया प्रति मिल गई। उसे पढ़ा तो पाया कि पिता का नाम ओम प्रकाश शर्मा की जगह ओमप्रकाश था प्रोपर्टी के पेपर में भी पिता के नाम में शर्मा लगा था। मुझे लगा कि उन्होंने पेपर देख लिए और पिता के नाम में शर्मा लगा पढ़ लिया तो गडबड़ हो जाएगी। मैने अंशुल को यह बात बताई। उसने कहा कि पापा इतना कोई नहीं देखता आप चिंता मत करों। उसकी बात मान तो ली किंतु घबराहट बनी रही फिर मन को सुकून दिया कि पासपोर्ट नहीं बनना होगा मत बने तनाव लेने से क्या लाभ।

मैने किसी के वीजा के इंटरव्यू के बारे में पढ़ा था कि आप से पूछने पर यह न बताएं कि वहां डिलीवरी होनी है। यह कहने पर वे वीजा नहीं देगें। और बताएगा कि उनके यहां चिकित्सा सुविधाएं बहुत अच्छी है। हमें भी अंशुल ने यहां सब बताया। यह कि यहां का उसका पता याद कर लेना। इंडिया और अमन की कंपनी का नाम भी। वे कई बार पूछ लेते है। फार्म हालांकि अंशुल ने भरा था। किंतु उसने कहा कि पूछने पर यही कहना कि हमने खुद भरा है। भरने की जानकारी कहां से ली पर बताना कि उससे स्काइप पर पूछते रहे और फार्म भरते रहे।

हमने .. के वैल्युपेपर बनवाते समय रिवाल्वर व राईफल की कीमत लिखाना चाहा तो अंंशुल ने मना कर दिया कहा कि इस पर वह कई प्रश्न करेंगे। शस्त्र चलाने की ट्रेनिंग कहा ली कैसे ली आदि। कहीं किसी आतंकवादी गुट से तो संबंध नहीं रहे। इसीलिए उसका कही भी जिक्र मत करना और हम चुप हो गए।

 

२० दिसंबर।

 

हम सात बजे तक गाजियाबाद से चल दिए। हिंडन पर पहुंचने का मंजुल को बता दिया। करोल बाग में थोडा मटक कर हम सर गंगा राम हॉस्पिटल के गेट पर रूक गए। वहीं वह आ गया। वह बाईक पर था। ठंड काफी थी हम चाहते थे कि वह कार में हमारे साथ ले। बाइक कमरे पर खड़ी कर दे। उसने बाइक पर ही चलना उचित समझा। हमसे कहा कि .... का समय होने जा रहा है ऐसे में जगह जगह जाम लगेगा और देर हो सकती है।

चलकर हम अमेरिकन एंवसी के एक गेट पर पहुंच गए। यहां काफी बाइक बाहर पार्क थी। दूसरी साइड में एक स्कूल था। स्कूल के सिक्यूरिटी वालो से पार्किग को पूछा। उन्होंने जगह बताई और कहा कि वही बाजार और सामुदायिक शौचालय भी है। हमने वही जाकर गाड़ी पार्क की। पास में ही मदर डेरी की दुकान थी। वहां मंजुल ने बाइक लगाई। पीछे बाजार में मैं निर्मल शौच आदि से फ्री हुए और एक दुकान पर आलू पराठे खाएं। दो पराठे आलू के २० रूपए प्लेट थी चाय दस रूपए की एक कप थी। पराठे अच्छे थे पर आलू में मिर्च ज्यादा थी। चाय पीकर हम तैयार हुए। हमें कार पार्किग की जगह बताया गया था कि बाए चलकर टी पाइंट से दाए मुड जाए। वहीं वीजा वालों की भीड़ रहती है।

इस समय तक इस मार्ग पर भीड़ भाड़ नहीं थी। टी पाइंट से आगे चौराहा था यहां से आगे खड़ी भीड़ भाड़ दिखाई देने लगी। पुलिस चौराहे पर ही मुस्तैद थी आगे वाहन नहीं जाने दिए जा रहे थे।

हम क्योंकि पहले ही पैदल थे हमें परेशानी नहीं हुई। आगे चौराहे पर भीड़ थी सड़क के वाई साइड में लाईन लगी थी। एक एक कर आदमी आगे जा रहा था। नीली ड्रेस में अमेरिकन एवंसी की लेडी थी जो एक एक पेपर चैक कर रहा था। हमारे द्वारा इंटरव्यू का समय साढ़े दस बजे बताने पर उसने हमें सड़क के दूसरी ओर जाने को कह दिया।

मैं, निर्मल,मंजुल और नीरज उधर पहुंच गए यहां पैरा मिलेट्री फोर्स की पिकेट थी और उसकी साइड में काफी भीड़ एकत्र थी। हमें बताया गया कि बैग आदि लेकर नहीं जाना किंतु यहां कई व्यक्ति बडे बडे बैग लिए थे यहां एकत्र व्यक्तियों में सभी उम्र वाले नौजवान युवक यूवतियां थी। तो हम जैसे सीनियर सिटीजन भी। वाहनों से भी व्यक्ति आकर उतर रहे थे इस चौराहे पर वाहनों के आने जाने की अनुमति थी किंतु वहां मार्ग बंद था जिससे हम आए थे।

यहां पुलिस पिकै ट के पीछे सड़क और ... के बीच काफी जगह थी। उस पर बैंच बनी थी। लोगों के बैठने के लिए पर बारिश से बचने के लिए कोई शेड नहीं था। न ही टाइलेट। मंजुल का ११ बजे से क्लास थी। सो वह और नीरज वापस हो गए और बताया गया कि इसके बाद साढ़े दस बजे की लाईन लगनी है उसमें लग जाना।

लगभग दस बजे साढ़े दस बजे की लाईन लग गई। यहां लाईन में पासपोर्ट और एपाइंटमेंट लेटर चैक कर आगे जाने दिया जा रहा था। यहीं सूचनाएं लगी थी कि कैमरा, मोबाइल, पेन ड्राइव व इलेक्ट्रेनिक सामान शस्त्र और स्प्रे ले जाना मना है। यह सामान यहां काउंटर पर जमा कर कराया जा रहा था। यहां हमने मोबाइल जमा किए। मेरे पर्स में दो मेमोरी कार्ड थे। उन्हे उन्होंने ले जाने को कह दिया। इन्हें सभी सामान ले जाने दिया। यहां से हम एक बिल्डिंग की दीवार के साथ आगे बढ रहे थे।  आगे बाएं हाथ पर हमे शीशे के दरवाजे से अंदर लिया जा रहा था। शीशे के दरवाजे से अंदर जाने पर पता चला कि वहां... चैक हो रहा है। एक ट्रे में मरी पाकेट का सामान रखवा कर एक्सरे मशीन में डाल दिया गया। उस दौरान मैं और निर्मल मेडल डिकेटर से आगे बड़े एक .... ने निर्मल की तलाशी ली...एक प्ररूप ने निर्मल की। मेरे शरीर की तलाशी के दौरान निर्मल ने मेरा सामान ले लिया और यहां से अंदर एंट्री दे दी गई। यहां स्टाफ लाईन से आने वालो के पासपोर्ट और आवेदन कन्फर्म लैटर लेकर उन्हें एवं साथ स्टेपिल कर दे रहा था।

आगे हमें नम्बर मिला एच७३। यहां काफी लंबी कुर्सी हाइटकी वैंच पड़ी थी। उन पर हम अपने नम्बर के इंजतार में बैठ गए।

इंटरव्यू में क्या होगा क्या पूछा जाएगा। इसे लेकर काफी तनाव था। वीजा मिलेगा या नहीं यह उहापोह लगातार बनी थी। यहां मैं ....... था जबकि टाइलेट काफी सारे। नंबर बुलाए जाने पर हमें

 

Comments